वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं

भारत की जी-20 की अध्यक्षता पर पीएम मोदी का लेख: मानव कल्याण के लिए मानसिकता में मूलभूत बदलाव लाने की होगी पहल
भारत का जी-20 एजेंडा समावेशी महत्वाकांक्षी कार्रवाई-उन्मुख और निर्णायक होगा। आइए हम भारत की जी-20 अध्यक्षता को संरक्षण सद्भाव और उम्मीद की अध्यक्षता बनाने के लिए एकजुट हों। आइए मानव-केंद्रित वैश्वीकरण के नए प्रतिमान को स्वरूप देने के लिए साथ मिलकर काम करें।
नरेन्द्र मोदी : जी-20 की पिछली 17 अध्यक्षता के दौरान वृहद आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने, अंतरराष्ट्रीय कराधान को तर्कसंगत बनाने और विभिन्न देशों पर कर्ज के बोझ को कम करने समेत कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए। हम इन उपलब्धियों से लाभान्वित होंगे तथा यहां से और आगे की ओर बढ़ेंगे। अब, जबकि भारत ने जी-20 अध्यक्षता का अहम दायित्व ग्रहण किया है तो मैं स्वयं से यह पूछता हूं कि क्या जी-20 अभी भी और आगे बढ़ सकता है? क्या हम समग्र मानवता के कल्याण के लिए मानसिकता में मूलभूत बदलाव लाने की पहल कर सकते हैं? मेरा विश्वास है कि हां, हम ऐसा कर सकते हैं।
परिस्थितियां ही हमारी मानसिकता को आकार देती हैं। अतीत से ही मानवता का जो स्वरूप होना चाहिए था, उसमें कुछ कमी दिखी। हम सीमित संसाधनों के लिए लड़े, क्योंकि हमारा अस्तित्व दूसरों को उन संसाधनों से वंचित करने पर निर्भर था। विचार, विचारधाराओं और पहचानों के बीच टकराव एवं प्रतिस्पर्धा को ही आदर्श मान बैठे। दुर्भाग्य से, हम आज भी उसी शून्य-योग की मानसिकता में अटके हुए हैं। हम इसे तब देखते हैं, जब विभिन्न देश कुछ इलाकों या संसाधनों के लिए आपस में लड़ते हैं। हम इसे तब देखते हैं, जब आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को हथियार बनाया जाता है। हम इसे तब देखते हैं, जब कुछ लोगों द्वारा टीकों की जमाखोरी की जाती है, भले ही अरबों लोग बीमारियों से असुरक्षित हों। कुछ लोग यह दलील दे सकते हैं कि टकराव और लालच मानवीय स्वभाव है। मैं इससे सहमत नहीं हूं।
अगर मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी है, तो हम सभी में मूलभूत एकात्मता की हिमायत करने वाली तमाम आध्यात्मिक परंपराओं के स्थायी आकर्षण को कैसे समझा जाए? भारत में प्रचलित ऐसी ही एक परंपरा है जो सभी जीवित प्राणियों और यहां तक कि निर्जीव चीजों को भी एक समान ही पांच मूल तत्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के पंचतत्व से बना हुआ मानती है। हमारे भौतिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय कल्याण के लिए हमारे अंतस और बाहरी परिवेश में इन तत्वों के बीच सामंजस्य आवश्यक है। भारत की जी-20 अध्यक्षता एकता की इस सार्वभौमिक भावना को बढ़ावा देने की दिशा में काम करेगी। इसीलिए हमारी थीम-एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य-है। यह सिर्फ एक नारा नहीं है। यह मानवीय परिस्थितियों में उन हालिया परिवर्तनों को ध्यान में रखता है, जिनकी सराहना करने में हम सामूहिक रूप से विफल रहे हैं।
आज हमारे पास विश्व में सभी लोगों की मलूभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त उत्पादन करने के साधन हैं। आज, हमें अपने अस्तित्व के लिए लड़ने की जरूरत नहीं है। हमारे युग को युद्ध का युग होने की जरूरत नहीं है। ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए! आज हम जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और महामारी जैसी जिन सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनका समाधान आपस में लड़कर नहीं, बल्कि मिलकर काम करके ही निकाला जा सकता है।
सौभाग्य से, आज की जो तकनीक है, वह हमें मानवता के व्यापक पैमाने पर समस्याओं का समाधान करने का साधन भी प्रदान करती है। आज हम जिस विशाल वर्चुअल दुनिया में रहते हैं, उससे हमें डिजिटल प्रौद्योगिकियों की व्यापकता का भी पता चलता है। भारत इस सकल विश्व का सूक्ष्म जगत है, जहां विश्व की आबादी का छठा हिस्सा रहता है और जहां भाषाओं, धर्मों, रीति-रिवाजों वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं और विश्वासों की विशाल विविधता है। सामूहिक निर्णय लेने की सबसे पुरानी ज्ञात परंपराओं वाली सभ्यता होने के नाते भारत दुनिया में लोकतंत्र के मूलभूत डीएनए में योगदान देता है। लोकतंत्र की जननी के रूप में भारत की राष्ट्रीय सहमति किसी आदेश से नहीं, बल्कि करोड़ों स्वतंत्र आवाजों को एक सुरीले स्वर में मिलाकर बनाई गई है।
आज, भारत सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। हमारे प्रतिभाशाली युवाओं की रचनात्मक प्रतिभा का पोषण करते हुए, हमारा नागरिक-केंद्रित शासन माडल बिल्कुल हाशिये पर खड़े लोगों का भी ख्याल रखता है। हमने राष्ट्रीय विकास को ऊपर से नीचे की ओर के शासन की कवायद नहीं, बल्कि एक नागरिक-नेतृत्व वाला ‘जन आंदोलन’ बनाने की कोशिश की है। हमने ऐसी डिजिटल जन उपयोगिताएं निर्मित करने के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाया है, जो खुली, समावेशी और अंतर-संचालनीय हैं। इनके कारण सामाजिक सुरक्षा, वित्तीय समावेशन और इलेक्ट्रानिक भुगतान जैसे विविध क्षेत्रों में क्रांतिकारी प्रगति हुई है। इन सभी कारणों से भारत के अनुभव संभावित वैश्विक समाधानों के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।
जी-20 अध्यक्षता के दौरान, हम भारत के अनुभव, ज्ञान और प्रारूप को दूसरों के लिए, विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए एक संभावित ढांचे (टेंपलेट) के रूप में प्रस्तुत करेंगे। हमारी जी-20 प्राथमिकताओं को, न केवल हमारे जी-20 भागीदारों, बल्कि ग्लोबल साउथ वाले हिस्से में हमारे साथ चलने वाले देशों, जिनकी बातें अक्सर अनसुनी कर दी जाती है, के परामर्श से निर्धारित किया जाएगा। हमारी प्राथमिकताएं हमारी ‘एक पृथ्वी’ को संरक्षित करने, हमारे ‘एक परिवार’ में सद्भाव बनाने और हमारे ‘एक भविष्य’ को आशान्वित करने पर केंद्रित होंगी।
अपने ग्रह को पोषित करने के लिए, हम प्रकृति की देखभाल करने वाली भारतीय परंपरा के आधार पर स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को प्रोत्साहित करेंगे। मानव परिवार के भीतर सद्भाव को प्रोत्साहन के लिए, हम खाद्य, उर्वरक और चिकित्सा उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति को गैर-राजनीतिक बनाने की कोशिश करेंगे, ताकि भू-राजनीतिक तनाव मानवीय संकट का कारण न बनें। जैसा हमारे परिवारों में होता है, जिनकी जरूरतें सबसे ज्यादा होती हैं, हमें उनकी चिंता सबसे पहले करनी चाहिए। हमारी आने वाली पीढ़ियों में उम्मीद जगाने के लिए हम बड़े पैमाने पर विनाश के हथियारों से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने और वैश्विक सुरक्षा बढ़ाने पर सर्वाधिक शक्तिशाली देशों के बीच एक ईमानदार बातचीत को प्रोत्साहन प्रदान करेंगे।
भारत का जी-20 एजेंडा समावेशी, महत्वाकांक्षी, कार्रवाई-उन्मुख और निर्णायक होगा। आइए, हम भारत की जी-20 अध्यक्षता को संरक्षण, सद्भाव और उम्मीद की अध्यक्षता बनाने के लिए एकजुट हों। आइए, मानव-केंद्रित वैश्वीकरण के नए प्रतिमान को स्वरूप देने के लिए साथ मिलकर काम करें।
G-20 की कमान आज से भारत के हाथों में, पढ़िए PM मोदी का लेख
G20 की कमान आज से भारत के हाथों में होगी, 1 दिसंबर यानी आज से भारत G20 की अध्यक्षता करेगा. इस मौके पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक लेख लिखा है और इस लेख के जरिए G-20 के लक्ष्य और जरूरत पर अपने विचार लिखे हैं. पूरा लेख पढ़े.
PM मोदी का लेख
G-20 की पिछली 17 अध्यक्षताओं के दौरान वृहद आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने, अंतरराष्ट्रीय कराधन (Taxation) को तर्कसंगत बनाने और विभिन्न देशों के सिर से कर्ज के बोझ को कम करने समेत कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए। हम इन उपलब्धियों से लाभान्वित होंगे तथा यहां से और आगे की ओर बढ़ेंगे।
अब, जबकि भारत ने इस महत्वपूर्ण पद को ग्रहण किया है, मैं अपने आपसे यह पूछता हूं- क्या G-20 अभी भी और आगे बढ़ सकता है? क्या हम समग्र मानवता के कल्याण के लिए मानसिकता में मूलभूत बदलाव लाने की पहल कर सकते हैं?
मेरा विश्वास है कि हां, हम ऐसा कर सकते हैं।
हमारी परिस्थितियां ही हमारी मानसिकता को आकार देती हैं। पूरे इतिहास के दौरान मानवता का जो स्वरूप होना चाहिए था, उसमें एक प्रकार की कमी दिखी। हम सीमित संसाधनों के लिए लड़े, क्योंकि हमारा अस्तित्व दूसरों को उन संसाधनों से वंचित कर देने पर निर्भर था। विभिन्न विचारों, विचारधाराओं और पहचानों के बीच, टकराव और प्रतिस्पर्धा को ही जैसे आदर्श मान बैठे।
दुर्भाग्य से, हम आज भी उसी शून्य-योग की मानसिकता में अटके हुए हैं। हम इसे तब देखते हैं, जब विभिन्न देश, क्षेत्र या संसाधनों के लिए आपस में लड़ते हैं। हम इसे तब देखते हैं, जब आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को हथियार बनाया जाता है। हम इसे तब देखते हैं, जब कुछ लोगों द्वारा टीकों की जमाखोरी की जाती है, भले ही अरबों लोग बीमारियों से असुरक्षित हों।
कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि टकराव और लालच मानवीय स्वभाव है। मैं इससे असहमत हूं। अगर मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी है, तो हम सभी में मूलभूत एकात्मता की हिमायत करने वाली इतनी सारी आध्यात्मिक परंपराओं के स्थायी आकर्षण को कैसे समझा जाए?
भारत में प्रचलित ऐसी ही एक परंपरा है जो सभी जीवित प्राणियों और यहां तक कि निर्जीव चीजों को भी एक समान ही पांच मूल तत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के पंचतत्व से बना हुआ मानती है। इन तत्वों का सामंजस्य - हमारे भीतर और हमारे बीच भी- हमारे भौतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय कल्याण के लिए आवश्यक है।
भारत की G-20 की अध्यक्षता दुनिया में एकता की इस सार्वभौमिक भावना को बढ़ावा देने की ओर काम करेगी। इसलिए हमारी थीम - 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' है।
ये सिर्फ एक नारा नहीं है। ये मानवीय परिस्थितियों में उन हालिया बदलावों को ध्यान में रखता है, जिनकी सराहना करने में हम सामूहिक रूप से विफल रहे हैं।
आज हमारे पास दुनिया के सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त उत्पादन करने के साधन हैं। आज, हमें अपने अस्तित्व के लिए लड़ने की जरूरत नहीं है - हमारे युग को युद्ध का युग होने की जरूरत नहीं है। ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए!
आज हम जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और महामारी जैसी जिन सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनका समाधान आपस में लड़कर नहीं, बल्कि मिलकर काम करके ही निकाला जा सकता है।
सौभाग्य से, आज की जो तकनीक है, वह हमें मानवता के व्यापक पैमाने पर समस्याओं का समाधान करने का साधन भी प्रदान करती है। आज हम जिस विशाल वर्चुअल दुनिया में रहते हैं, उससे हमें डिजिटल प्रौद्योगिकियों की व्यापकता का भी पता चलता है।
भारत इस सकल विश्व का सूक्ष्म जगत है, जहां विश्व की आबादी का छठा हिस्सा रहता है और जहां भाषाओं, धर्मों, रीति-रिवाजों और विश्वासों की विशाल विविधता है।
सामूहिक निर्णय लेने की सबसे पुरानी ज्ञात परंपराओं वाली सभ्यता होने के नाते भारत दुनिया में लोकतंत्र के मूलभूत डीएनए में योगदान देता है। लोकतंत्र की जननी के रूप में भारत की राष्ट्रीय सहमति किसी आदेश से नहीं, बल्कि करोड़ों स्वतंत्र आवाजों को एक सुरीले स्वर में मिला कर बनाई गई है।
आज, भारत सबसे तेजी वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। हमारे प्रतिभाशाली युवाओं की रचनात्मक प्रतिभा का पोषण करते हुए, हमारा नागरिक-केंद्रित शासन मॉडल एकदम हाशिए पर खड़े लोगों का भी ख्याल रखता है।
हमने राष्ट्रीय विकास को ऊपर से नीचे की ओर के शासन की कवायद नहीं, बल्कि एक नागरिक-नेतृत्व वाला 'जन आंदोलन' बनाने की कोशिश की है।
हमने ऐसी डिजिटल जन उपयोगिताएं निर्मित करने के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाया है जो खुली, समावेशी और अंतर-संचालनीय हैं। इनके कारण सामाजिक सुरक्षा, वित्तीय समावेशन और इलेक्ट्रॉनिक भुगतान जैसे विविध क्षेत्रों में क्रांतिकारी प्रगति हुई है।
इन सभी कारणों से भारत के अनुभव संभावित वैश्विक समाधानों के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं। G-20 अध्यक्षता के दौरान, हम भारत के अनुभव, ज्ञान और प्रारूप को दूसरों के लिए, विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए एक संभावित टेम्प्लेट के रूप में प्रस्तुत करेंगे।
हमारी G-20 प्राथमिकताओं को, न केवल हमारे G-20 भागीदारों, बल्कि दुनिया के दक्षिणी हिस्से में हमारे साथ चलने वाले देशों, जिनकी बातें अक्सर अनसुनी कर दी जाती है, के परामर्श से निर्धारित किया जाएगा।
हमारी प्राथमिकताएं हमारी 'एक पृथ्वी' को संरक्षित करने, हमारे 'एक परिवार' में सद्भाव पैदा करने और हमारे 'एक भविष्य' को आशान्वित करने पर केंद्रित होंगी। अपने प्लेनेट को पोषित करने के लिए, हम भारत की प्रकृति की देख-भाल करने की परंपरा के आधार पर स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल जीवन शैली को प्रोत्साहित करेंगे।
मानव परिवार के भीतर सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए, हम खाद्य, उर्वरक और चिकित्सा उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति को गैर-राजनीतिक बनाने की कोशिश करेंगे, ताकि भू-राजनीतिक तनाव मानवीय संकट का कारण न बनें। जैसा हमारे अपने परिवारों में होता है, जिनकी जरूरतें सबसे ज्यादा होती हैं, हमें उनकी चिंता सबसे पहले करनी चाहिए।
हमारी आने वाली पीढ़ियों में उम्मीद जगाने के लिए, हम बड़े पैमाने पर विनाश के हथियारों से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने और वैश्विक सुरक्षा बढ़ाने पर सर्वाधिक शक्तिशाली देशों के बीच एक ईमानदार बातचीत को प्रोत्साहन प्रदान करेंगे।
भारत का G-20 एजेंडा समावेशी, महत्वाकांक्षी, कार्रवाई-उन्मुख और निर्णायक होगा।
आइए, हम भारत की G-20 अध्यक्षता को संरक्षण, सद्भाव और उम्मीद की अध्यक्षता बनाने के लिए एकजुट हों।
आइए, हम मानव-केंद्रित वैश्वीकरण के एक नए प्रतिमान को स्वरूप देने के लिए साथ मिलकर काम करें।
आज भारत की जी-20 की अध्यक्षता की पारी शुरू
हमारी आने वाली पीढ़ियों में उम्मीद जगाने के लिए हम बड़े पैमाने पर विनाश के हथियारों से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने और वैश्विक सुरक्षा बढ़ाने पर सर्वाधिक शक्तिशाली देशों के बीच एक ईमानदार बातचीत को प्रोत्साहन प्रदान करेंगे.
जी 20 की पिछली 17 अध्यक्षताओं के दौरान वृहद आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने, अंतरराष्ट्रीय कराधान को तर्कसंगत बनाने और विभिन्न देशों के सिर से कर्ज के बोझ को कम करने समेत कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आये. हम इन उपलब्धियों से लाभान्वित होंगे तथा यहां से और आगे की ओर बढ़ेंगे. अब, जबकि भारत ने इस महत्वपूर्ण पद को ग्रहण किया है, मैं अपने आपसे यह पूछता हूं- क्या जी-20 अभी भी और आगे बढ़ सकता है?
क्या हम समग्र मानवता के कल्याण के लिए मानसिकता में मूलभूत बदलाव को उत्प्रेरित कर सकते हैं? मेरा विश्वास है कि हम ऐसा कर सकते हैं. हमारी परिस्थितियां ही हमारी मानसिकता को आकार देती हैं. पूरे इतिहास के दौरान, मानवता अभाव में रही. हम सीमित संसाधनों के लिए लड़े, क्योंकि हमारा अस्तित्व दूसरों को उन संसाधनों से वंचित कर देने पर निर्भर था. विभिन्न विचारों, विचारधाराओं और पहचानों के बीच, टकराव और प्रतिस्पर्धा आदर्श बन गये.
दुर्भाग्य से, हम आज भी वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं उसी शून्य-योग की मानसिकता में अटके हुए हैं. हम इसे तब देखते हैं, जब विभिन्न देश क्षेत्र या संसाधनों के लिए आपस में लड़ते हैं. हम इसे तब देखते हैं, जब आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को हथियार बनाया जाता है. हम इसे तब देखते हैं, जब कुछ लोगों द्वारा टीकों की जमाखोरी की जाती है, भले ही अरबों लोग बीमारियों से असुरक्षित हों. कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि टकराव और लालच मानवीय स्वभाव है.
मैं इससे असहमत हूं. अगर मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी है, तो हम सभी में मूलभूत एकात्मता की हिमायत करने वाली इतनी सारी आध्यात्मिक परंपराओं के स्थायी आकर्षण को कैसे समझा जाए? भारत में प्रचलित ऐसी ही एक परंपरा है, जो सभी जीवित प्राणियों और यहां तक कि निर्जीव चीजों को भी एक समान ही पांच मूल तत्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- के पंचतत्व से बना हुआ मानती है. इन तत्वों का सामंजस्य- हमारे भीतर और हमारे बीच भी- हमारे भौतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय कल्याण के लिए आवश्यक है.
भारत की जी-20 की अध्यक्षता दुनिया में एकता की इस सार्वभौमिक भावना को बढ़ावा देने की ओर काम वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं करेगी. इसलिए हमारी थीम 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' है. यह सिर्फ एक नारा नहीं है. यह मानवीय परिस्थितियों में उन हालिया बदलावों को ध्यान में रखता है, जिनकी सराहना करने में हम सामूहिक रूप से विफल रहे हैं. आज हमारे पास दुनिया के सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त उत्पादन करने के साधन हैं. आज, हमें अपने अस्तित्व के लिए लड़ने की जरूरत नहीं है, हमारे युग को युद्ध का युग होने की जरूरत नहीं है.
ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए. आज हम जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और महामारी जैसी जिन सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनका समाधान आपस में लड़कर नहीं, बल्कि मिलकर काम करके ही निकाला जा सकता है. सौभाग्य से, आज की जो तकनीक है, वह हमें मानवता के व्यापक पैमाने पर समस्याओं का समाधान करने का साधन भी प्रदान करती है.
आज हम जिस विशाल वर्चुअल वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं दुनिया में रहते हैं, वह डिजिटल प्रौद्योगिकियों की मापनीयता को प्रदर्शित करती है. भारत इस सकल विश्व का सूक्ष्म जगत है, जहां विश्व की आबादी का छठवां हिस्सा रहता है और जहां भाषाओं, धर्मों, रीति-रिवाजों और विश्वासों की विशाल विविधता है. सामूहिक निर्णय लेने की सबसे पुरानी ज्ञात परंपराओं वाली सभ्यता होने के नाते भारत दुनिया में लोकतंत्र के मूलभूत डीएनए में योगदान देता है. लोकतंत्र की जननी के रूप में भारत की राष्ट्रीय सहमति किसी फरमान से नहीं, बल्कि करोड़ों स्वतंत्र आवाजों को एक सुरीले स्वर में मिला कर बनायी गयी है.
आज भारत सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है. हमारे प्रतिभाशाली युवाओं की रचनात्मक प्रतिभा का पोषण करते हुए, हमारा नागरिक-केंद्रित शासन मॉडल एकदम हाशिये पर पड़े नागरिकों का भी ख्याल रखता है. हमने राष्ट्रीय विकास को ऊपर से नीचे की ओर के शासन की कवायद नहीं, बल्कि एक नागरिक-नेतृत्व वाला 'जन आंदोलन' बनाने की कोशिश की है. हमने ऐसी डिजिटल जन उपयोगिताएं निर्मित करने के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाया है, जो खुली, समावेशी और अंतर-संचालनीय हैं.
इनके कारण सामाजिक सुरक्षा, वित्तीय समावेशन और इलेक्ट्रॉनिक भुगतान जैसे विविध क्षेत्रों में क्रांतिकारी प्रगति हुई है. इन सभी कारणों से भारत के अनुभव संभावित वैश्विक समाधानों के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं. जी-20 अध्यक्षता के दौरान, हम भारत के अनुभव, ज्ञान और प्रारूप को दूसरों के लिए, विशेष रूप से वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं विकासशील देशों के लिए एक संभावित टेम्पलेट के रूप में प्रस्तुत करेंगे.
हमारी जी-20 प्राथमिकताओं को न केवल हमारे जी-20 भागीदारों, बल्कि वैश्विक दक्षिण में हमारे साथ चलने वाले देशों, जिनकी बातें अक्सर अनसुनी कर दी जाती है, के परामर्श से निर्धारित किया जायेगा. हमारी प्राथमिकताएं हमारी 'एक पृथ्वी' को संरक्षित करने, हमारे 'एक परिवार' में सद्भाव पैदा करने और हमारे 'एक भविष्य' को आशान्वित करने पर केंद्रित होंगी. अपने प्लेनेट को पोषित करने के लिए हम भारत की प्रकृति की देखभाल करने की परंपरा के आधार पर स्थायी और पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली को प्रोत्साहित करेंगे.
मानव परिवार के भीतर सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए, हम खाद्य, उर्वरक और चिकित्सा उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति को गैर-राजनीतिक बनाने की कोशिश करेंगे, ताकि भू-राजनीतिक तनाव मानवीय संकट का कारण न बनें. जैसा हमारे अपने परिवारों में होता है, जिनकी जरूरतें सबसे ज्यादा होती हैं, हमें उनकी चिंता सबसे पहले करनी चाहिए. हमारी आने वाली पीढ़ियों में उम्मीद जगाने के लिए हम बड़े पैमाने पर विनाश के हथियारों से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने और वैश्विक सुरक्षा बढ़ाने पर सर्वाधिक शक्तिशाली देशों के बीच एक ईमानदार बातचीत को प्रोत्साहन प्रदान करेंगे.
भारत का जी-20 एजेंडा समावेशी, महत्वाकांक्षी, कार्रवाई-उन्मुख और निर्णायक होगा. आइए, हम भारत की जी-20 अध्यक्षता को संरक्षण, सद्भाव और उम्मीद की अध्यक्षता बनाने के लिए एकजुट हों. आइए, हम मानव-केंद्रित वैश्वीकरण के एक नये प्रतिमान को स्वरूप देने के लिए साथ मिलकर काम करें.
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मनरेगा की प्रभावशीलता को देखने के लिए सरकार ने बनाया पैनल
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केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं अधिनियम (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) मनरेगा योजना के कार्यान्वयन की समीक्षा करने, विशेष रूप से गरीबी उन्मूलन उपकरण के रूप में कार्यक्रम की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए एक समिति का गठन किया है। पूर्व ग्रामीण विकास सचिव अमरजीत सिन्हा (former Rural Development secretary Amarjeet Sinha) की अध्यक्षता वाली समिति की पहली बैठक 21 नवंबर, 2022 को हुई थी और उसे अपने सुझाव देने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) 2005 में पारित किया गया था, और मांग-संचालित योजना प्रत्येक ग्रामीण परिवार के लिए प्रति वर्ष 100 दिनों के अकुशल काम की गारंटी देती है जो इसे चाहता है। इस योजना के तहत वर्तमान में 15.51 करोड़ सक्रिय कार्यकर्ता नामांकित हैं।
सिन्हा समिति को अब मनरेगा (MGNREGA) कार्य की मांग, व्यय प्रवृत्तियों और अंतर-राज्यीय भिन्नताओं और कार्य की संरचना के पीछे विभिन्न कारकों का अध्ययन करने का काम सौंपा गया है। यह सुझाव देगा कि मनरेगा (MGNREGA) को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए फोकस और शासन संरचनाओं में क्या बदलाव की आवश्यकता है।
“मनरेगा (MGNREGA) को ग्रामीण क्षेत्र के लिए गरीबी उन्मूलन (poverty alleviation) साधन के रूप में शुरू किया गया था, जो उन्हें गारंटीकृत काम और मजदूरी के रूप में सुरक्षा जाल प्रदान करता है। यह महसूस किया गया कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां गरीबी का स्तर अधिक है, वे इस योजना का बेहतर उपयोग नहीं कर पाए हैं,” मामले से वाकिफ एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा।
2015 में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने मनरेगा को “कांग्रेस सरकार की विफलता का जीवंत स्मारक” कहा था। जगदीश भगवती और अरविंद पनगढ़िया जैसे अर्थशास्त्रियों ने भी इस योजना की आलोचना “गरीबों को आय को स्थानांतरित करने के अक्षम साधन” के रूप में की है।
वर्तमान समिति इस तर्क पर भी गौर करेगी कि योजना शुरू होने के बाद से काम उपलब्ध कराने की लागत भी बढ़ गई है।
समिति को कारणों की समीक्षा करनी होगी और गरीब क्षेत्रों पर अधिक वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं ध्यान केंद्रित करने के तरीकों की सिफारिश करनी होगी। “इस तरह की एक ओपन-एंडेड योजना हमेशा तीव्र विरोधाभास दिखाएगी। उदाहरण के लिए, बिहार, गरीबी के स्तर के बावजूद, एक ठोस अंतर बनाने के लिए पर्याप्त काम नहीं करता है, और स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर हमारे पास केरल है जो आर्थिक रूप से बेहतर है लेकिन संपत्ति निर्माण के लिए इसका उपयोग कर रहा है। जबकि बिहार को मनरेगा (MGNREG) की अधिक आवश्यकता है, वित्तीय साधन कैसे काम करते हैं हम कार्यक्रम की वर्तमान संरचना के कारण केरल को धन से वंचित नहीं कर सकते,” समिति के सदस्यों में से एक ने समझाया।
मनरेगा (MGNREG) के आलोचक मूर्त संपत्ति निर्माण की कमी के लिए भी इस योजना की आलोचना करते हैं। समिति इस बात का अध्ययन करेगी कि क्या योजना के तहत वर्तमान में किए गए कार्यों की संरचना में परिवर्तन किया जाना चाहिए। यह समीक्षा करेगा कि क्या इसे समुदाय-आधारित संपत्ति या व्यक्तिगत कार्यों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
वित्तीय वर्ष समाप्त होने में चार महीने और बाकी हैं, योजना के लिए स्वीकृत 73,000 करोड़ रुपए में से 59,420 करोड़ रुपए पहले ही खर्च किए जा चुके हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय (Rural Development Ministry) ने हाल ही में वित्त मंत्रालय से वित्तीय वर्ष समाप्त होने से पहले अनुमानित खर्च के लिए 25,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि मांगी है।
तमाम आलोचनाओं के बावजूद, मनरेगा ने COVID महामारी के दौरान एक महत्वपूर्ण सुरक्षा जाल के रूप में काम किया। वित्तीय वर्ष 2020-21 में, योजना के तहत प्रदान किए गए कार्य दिवसों की संख्या पिछले वर्ष के केवल 265 करोड़ के आंकड़े की तुलना में 389 करोड़ हो गई। 2021-22 में भी मनरेगा के काम की मांग ज्यादा रही और 363 करोड़ व्यक्ति दिवस को काम सृजित हुआ। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष 196 करोड़ व्यक्ति दिवस कार्य पहले ही सृजित किए जा चुके हैं।